मंगलवार, 15 अगस्त 2017

जहँ-जँह चरण पड़ें ....

               *  
              इंसानी कारस्तानियों से तो अब सारी दुनिया पनाह माँगने लगी है .एक छोटा सा उदाहरण अभी हाल ही में सामने आया है.अमेरिका का, अपनी विविधता के लिये विख्यात येलोस्टोन नेशनल पार्क , जो इतना विशाल है कि  तीन राज्यों में - मोंटाना,व्योमिंग और आइडाहो -फैला है . इसे  धरती मां की जीवंत प्रयोगशाला कह सकते हैं जिस में विकास और विनाश के रहस्य अध्ययन करने का पूरा पूरा अवसर है.पृथ्वी के निर्माण और संचालन प्रक्रिया को समझने के लिए यह क्षेत्र आदर्श है , यही नहीं यहाँ ११,००० वर्षों से मानवीय गतिविधियां निर्बाध रूप से चल रही हैं इस लिए जैाविक और भूतलीय विविधताओं का सिलसिलेवार लेखा मौजूद है.  
                    ये मनुष्य नामक जीव हर जगह अपनी टाँग अड़ाने पहुँच जाता है .प्रकृति के सारे  सुनियोजित कार्यों और सार्थक व्यवहारों को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है -बिना जाने कि परिणाम क्या होगा .नेशनल पार्क सर्विस की स्थापना के बाद से १९१६ में इसे उसके अधीन कर दिया गया. और  जंगल के प्राकृत नियमों की जगह इंसानी व्यवस्था के प्रभाव में आने लगा.उसे सिर्फ़ अपनी पड़ी है.प्रकृति को सब का सब-कुछ
आगे भविष्य तक का सोच कर आगे बढ़ना होता है. होता है .एक पूरी शृंखला पड़ी है उसके लिये - जड़ से लेकर चेतना के उच्चस्तरों तक .जिन्हें हम जड़ समझते हैं ,भू-तल,नदी पर्वत से लेकर  उद्भिज अंडज,योनिज सब अपने संपूर्ण भाग-अनुभागों  विभागों सहित .और सब में  ताल-मेल बैठाने का दायित्व सँभालती है .सारे एक दूसरे को प्रभावित करते हुये और होते हुये.पशु-पक्षियों से लेकर वनस्पतियाँ ,नदियाँ मिट्टी तक आपसी तालमेल से जुड़े रहते हैं ,एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और करते हैं.सब में ऐसी   घनिष्ठता कि एक कड़ी में व्यवधान पड़ेतो सारी शृंखला हिल जाये.सच में तो यही उसका कारॆॆॆ कार्यक्षेत्र है, उसकी प्रयोगशाला है जहाँ अनगिनती प्रयोग लगातार चलते  हैं -न समय की कोई सीमा  न सामग्री की .अतुल भंडार है उसका ,जब जो चाहती है उगा लेती है.एक पेड़ के लिये सैकड़ों बीज एक फल के लिये अऩगिन फूल . और  मूर्ख आदमी समझे बैठा है उसके सुख  के लिये हैं ये सब.यह आयोजना बड़ी लंबी-चौड़ी है.लयबद्धता के साथ ऋतु-क्रम में सारे संतुलन बैठाने की सामर्थ्य प्रकृति के मदरबोर्ड की जीवन्त प्रोग्रामिंग से ही हो सकती  है ..
                 प्राकृतिक जीवन के सामान्य कार्य संपादन तक की अक्ल या  तो है नहीं चल पड़ता है  अपना फ़ितूर लेकर .यहाँ भी सुनियोजित  शृंखला की घनिष्ठ कड़ियों में तोड़-मोड़ करने लगा .जंगल का सारा संतुलन बिगाड़ कर  रख  दिया. सब गड़बड़ होने लगा - नदियाँ विध्वंस पर उतारू हो गई ,भूमि कटने  लगी जंगल  तरुहीन होने लगे,पक्षी पलायन कर गये. हरा-भरा प्रदेश  उजाड़ होने लगा.प्रकृति की योजना में सेंध लगा  सारी व्यवस्था भंग हो गई .
               उसने किया ये  कि बेकार की आफ़त समझ कर जंगल से भेड़ियों का  सफ़ाया कर दिया -70 साल तक भेड़िया रहित बनाये रखा रहा  जंगल को . परिणामतः  हिरणों की भरमार हो गई ,दुर्लभ और उपयोगी वनस्पतियाँ उनके चराव से नष्ट होने लगीं.छोटे पौधे पत्रहीन हो सूख गये ,नये वृक्ष उगना बंद ,पुराने जर्जर.  पक्षी आश्रयहीन हो पलायन कर गये.बीवर जो नदियों में बाँध  बना कर उन्हें संयमित करते थे पलायन कर गये.नदियों का प्रवाह अनियंत्रित हो मनमानी करने लगा.पशु-पक्षियों के बिना बीजों का बिखराव कैसे हो  ,ऊपर से बढ़ता जाता हिरणों की चराव ,हरा-भरा वन उजड़ कर मरुथल बनने लगा
                यह सब  था आदमी के दिमाग़ी फ़ितूर का नतीजा. खिड़कियाँ कुछ खुलीं तो 1995 में फिर से  भेड़ियों का झुंड  जंगल में भेजा गया .जीवन व्यवस्थित होने लगा  नवागतों के  शिकार से हिरणों की संख्या घटी ,धरती पर वनस्पतियाँ पनपने लगीं .पौधे पनपने बड़े होने से पक्षियों की चहक फिर गूँजने लगी . उन्होंने फल कुतर-कुतर कर दूर-दूर तक बीज बिखेरे, नई वृक्षावियाँ सज गईँ . छः-सात वर्षों में जंगल लहलहा उठा.
बीवर लौट आये नदियों पर बाँध बनाने लगे ,नदियाँ संयत हुईं.जलपक्षी बिहार करने लगे.सियारों को भी मारा भेड़ियों ने ,परिणामतः  खरगोशों और चूहों की संख्या बढ़ी ,लोमड़ियाँ ललचाईं ,फिर उनके खाने से बचे अवशेषों पर बाज़-गिद्धों को आमंत्रण मिला.फलदार पेड़ों ने भालुओँ को दावत दी, जिनके आने से हिरण और भेड़ियों पर नियंत्रण हुआ.बीवरों के बाँधों से नदियों की मनमानी नहीं चली ,मिट्टी का कटान रुक गया.सारा क्रम व्यवस्थित हो गया.भेड़ियों की आवक क्या हुई  जंगल का जीवन फिर गुलज़ार हो गया .
               यहाँ कहीं कुछ भी व्यर्थ या असंबद्ध नहीं.यों देखा जाय तो मनुष्य भी उसी शृंखला की एक कड़ी है ,उसका भी शेष सबसे घनिष्ठ संबंध है .एक ही ऋत सबका संचालक - पर कैसा दुर्मति  है , इंसान प्रकृति के तारतम्यमय जीवन में दखलंदाज़ी कर  सारी समरसता विकृत कर डालता है. 
   आदमी नाम का ये प्राणी कब क्या करेगा कोई ठिकाना नहीं , दिमाग़ हमेशा किसी खुराफ़ात के चक्कर में रहता -रातों में नकली  रोशनी में काम करता है , दिन में रोशनी के रास्ते बंदकर आराम करता है.न समय पर जागता है न समय से सोता है .खाने को जाने क्या अल्लम-गल्लम ,पीने को कुछ विचित्र मिश्रण ,पहनने को अजीब ढंग के चिपके ,ढीले,बेतुके ,बनावटी कपड़े . हवा-पानी ,ज़मीन-आसमान हर जगह कुछ न कुछ लफड़े. अपनी सारी  सहजवृत्तियाँ कुंठित कर ली ,लगता है कुछ समय में ये भी भूल जायेगा कि जीवों में किस जाति का प्राणी है .किताबें खोल कर पता करना पड़ेगा कि सृष्टि के विकास क्रम में कहाँ खड़ा है.
यही सब देख कर अब तो  विश्वास हो चला है   -
                'जहँ जहँ चरण पड़ें मनुजन के तहँ-तहँ बंटाढार '.
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सोमवार, 7 अगस्त 2017

ये भी सुन लीजिये --

Suryakant Madhav Karandikar की वाल से -

*" उरुग्वे "* एक ऐसा देश है , जिसमे औसतन हर एक आदमी के पास 4 गायें हैं ... और
पूरे विश्व में वो खेती के मामले में नम्बर वन की पोजीशन में है ...
सिर्फ 33 लाख लोगों का देश है और 1 करोड़ 20 लाख 🐄 गायें है ...
हर एक 🐄 गाय के कान पर इलेक्ट्रॉनिक 📼 चिप लगा रखी है ...
जिससे कौन सी 🐄 गाय कहाँ पर है , वो देखते - रहते हैं ...
एक किसान मशीन के अन्दर बैठा , फसल कटाई कर रहा है , तो दूसरा उसे स्क्रीन पर जोड़ता है , कि फसल का डाटा क्या है ... ???
इकठ्ठा किये हुये डाटा के जरिए , किसान प्रति वर्ग मीटर की पैदावार का स्वयं विश्लेषण करता हैं ...
2005 में 33 लाख लोगों का देश , 90 लाख लोगों के लिए अनाज पैदा करता था ... और ...
आज की तारीख में 2 करोड़ 80 लाख लोगों के लिये अनाज पैदा करता है ...
*" उरुग्वे "* के सफल प्रदर्शन के पीछे देश , किसानों और पशुपालकों का दशकों का अध्ययन शामिल है ...
पूरी खेती को देखने के लिए 500 कृषि इंजीनियर लगाए गए हैं और ये लोग ड्रोन और सैटेलाइट से किसानों पर नजर रखते हैं , कि खेती का वही तरीका अपनाएँ जो निर्धारित है ...
यानि *" दूध , दही , घी , मक्खन "* के साथ आबादी से कई गुना ज्यादा अनाज उत्पादन ...
*" सब अनाज , दूध , दही , घी , मक्खन , आराम से निर्यात होते हैं और हर किसान लाखों में कमाता है ... "*
एक आदमी की कम से कम आय 1,25,000/= महीने की है , यानि 19,000 डॉलर सालाना ...
*" इस देश का राष्ट्रीय चिन्ह सूर्य 🌞 व राष्ट्रीय प्रगति चिन्ह गाय 🐄 व घोड़ा 🐎 हैं ... "*
*" उरूग्वे में गाय 🐄 की हत्या पर तत्काल फाँसी का कानून है ...
*" धन्य है , यह गौ - प्रेमी देश ... "*
मुख्य बात यह है , *" कि ये सभी गो - धन भारतीय हैं ... "*
जिसे वहाँ *" इण्डियन काउ "* के तौर पर जानते हैं ...
*" दु:ख इस बात का है , कि भारत में गो - हत्या होती है और वहाँ उरुग्वे में गो - हत्या पर मृत्युदण्ड का प्रावधान है ... "*
*" क्या हम इस कृषक राष्ट्र उरुग्वे से कुछ सीख सकते हैं ... ???
*" _ Forwarded as received ... _ "*


शनिवार, 29 जुलाई 2017

हम भी हैं पाप के भागी -

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रात्रि आधी से अधिक बीत चुकी थी ,हमलोगों को लौटने में बहुत देर हो गई थी ,उस कालोनी में अँधेरा पड़ा था.कारण बताया गया कि रात्रि-चर और वन्य-प्राणी भ्रमित न हों इसलिये रोशनियाँ बंद कर दी गई हैं.मन आश्वस्त हुआ .
पिछले दिनों एक समाचार बहुत सारे प्रश्न जगा गया था-  ऋतु-क्रम में होनेवाली अपनी प्रव्रजन यात्रा में दो हज़ार पक्षी टोरेंटो से जीवित नहीं लौट सके. जी हाँ ,दो हज़ार पक्षी . प्रव्रजन  क्रम में काल का ग्रास बन गये. प्रकृति के सुन्दर निष्पाप जीव मनुष्य के सुख-विलास के, उसकी असीमित सुख- लिप्सा की भेंट चढ़ गये.दो हज़ार पक्षी !वहीं के वहीं दम तोड़ गए. रात में मानवकृत रोशनियों से भरमा कर उड़े ,ऊंची इमारतें अड़ी खड़ी थीं ,खिडकी के शीशों में खुले आकाश और वनस्पतियों के प्रतिबिंब, जिन्हें देख अच्छा खासा आदमी भरमा जाये ,पूरे वेग से उडान भरी .अगले ही क्षण  ज़ोरदार टक्कर खाकर टूटे पंख और घायल शरीर ले  होश-हवास गुमा धरती पर आ गिरे .कैसी यंत्रणामय  मृत्यु रही होगी !
गगनचुंबी इमारतें ,बनावटी रोशनियाँ और शीशेदार खिड़कियाँ - बेचारे पक्षी विवश और भ्रमित होते रहे - ठंडी हवाओं में ,राह रोकती इमारतों के कारण उड़ न सके ,शीत से जम गये, रात को कृत्रिम रोशनी उन्हें भरमा  देती ,दिन में खिड़कियों के शीशों में वृक्ष-वनस्पतियोंवाले आकाश के प्रतिबिंबों से भ्रमित  वेग से उड़ते , टकराते ,घायल हो  गिरते, तड़पते मरते  रहे .उन्होंने प्रकृति के अनुकूल आचरण किया था - काहे की सज़ा मिली ?मनुष्य अपनी खुराफ़ातों से बाज़ नहीं आता ,अपने स्वार्थ के लिये दूसरों की बलि चढ़ा देता है .

घटना टोरेंटो की है पर उसके पीछे का कटु यथार्थ ,किसी न किसी रूप में सारी दुनिया की असलियत सामने रख रहा है. हम भी उसी  दुनिया के भोगी हैं - इस पाप के भागीदार !अपने भीतर झाँक कर देखें -क्या सबकी आवश्यकताओं का ध्यान रख हम अपनी ज़रूरत भर का ले रहे हैं या सबका हिस्सा हड़प रहे हैं.अपने छोटे से स्वार्थ पूरने को  निसर्ग के तत्वों को प्रदूषित किये जा रहे हैं.दूसरों का जीवन अँधेरा कर रहे हैं. अन्य जीवधारियों का हक छीन कर ,उन्हें जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी वंचित कर ,आज का सभ्य कहलानेवाला आदमी अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाये चला जा रहा है . नदियाँ इतनी प्रदूषित कर डालीं कि जल जीवन के योग्य नहीं रहा,  बेबस प्राणी कहाँ जा कर अपनी प्यास बुझायें .धरती, आकाश, सागर कोई ठौर निरापद नहीं रहने दिया. अंतरिक्ष में कूड़े का ढेर इकट्ठा कर दिया .सरल जीवन को जटिल बना कर रख दिया .न शान्ति से रह पाता है न दूसरों को चैन लेने देता है. 
अपनी बेलगाम ज़रूरतों के कारण कितने स्वार्थी हो गया मानव समाज , तृष्णाओँ की कोई सीमा रही ही नहीं .प्रकृति ने जीव-मात्र की तुष्टि और पुष्टि का विधान किया था .इसी क्रम में मनुष्य़ को सर्वाधिक विकसित ,समर्थ और बुद्धिमान बनाया कि वह सबका संरक्षक-सहायक बन अपना दायित्व निभाए . पर वही अब सब के संताप का कारण बन गया है.इस अति का प्रतिफल प्रकृति देगी ज़रूर ,किसी न किसी रूप में,आज नहीं तो कल .
         हमें लौटना होगा प्रकृति की ओर ,सहजताकी ओर . यह बोध जागना बहुत ज़रूरी है कि सब के साथ सहभागिता निभा कर ही हम इस संसार को रहने योग्य बना सकते हैं ,अन्यथा हमारे लिये भी कहीं सुरक्षित ठौर नहीं बचनेवाला .
प्रकृति की योजना का अनुसरण करते निरीह जीवधारियों की प्यास ,तृप्ति पाती रहे ,साँसें निरापद रहें. रात्रियाँ ,काल का ग्रास बने भ्रमजाल का पर्याय न बन विश्राम-प्रहर बनी रहें. चेत जाना है हमें कि सृष्टि की विविधता और निरंतरता बनी रहे. 

बुधवार, 19 जुलाई 2017

आगे-आगे देखिये होता है क्या ...

* जन्म से लेकर मृत्यु तक हम वस्त्रों में ही लिपटे रहते हैं.
वस्त्र-विन्यास का यह तीसरा युग है . पहला युग - प्राकृतिक उपादानों से निर्मित बाह्य तत्वों से ,शरीर के संरक्षण के लिये,
दूसरा - फ़ैशन के लिये .परिधानों  का चयन - .रुचिपूर्ण ढंग से अच्छा लुक देकर सजाने,दिखाने के लिये .
इसी क्रम में  1935 से सिंथेटिक फ़ाइबर चलन में आया ,जो प्राकृतिक वस्त्रों से अधिक दमदार,अधिक क्षमता-संपन्न, विशेष कार्यो के लिये उपयोगी-,स्ट्रानट्स के लिये ,एंटी वेलेस्टिक वेस्ट्स,,अधिक तापरोधी,अग्निशामकों और कार रेसर्स के लिये विशेष उपयोगी.
ये तो आपने सुन ही लिया होगा कि दूध से कपड़े बनाने में सफलता मिल गई है. जी हाँ ,दूध का प्रोटीन-नीले काले भूरे रंगों में टेक्सटाइल रेशम की तरह मुलायम -सूँधने में दूध की कोई महक नहीं. इसका श्रेय है आंके डोमास्के को जो डिज़ाइनर हैं और माइक्रोबायोलॉजिस्ट भी.ये कपड़े एकदम ईको फ़्रेंडली हैं , खाया भी जा सकता है.
और अब तीसरे क्रम में सचेत बोध वाले वस्त्र -- यह वस्त्र-विन्यास निष्क्रिय होकर शरीर को केवल  ढाके न रह कर .पहननेवाले की सुरक्षा के लिये जुम्मेदारी से संपन्नभी निभाएगा.
तीसरा चरण निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है.
न्यूयार्क की सेंसटेक्स एक स्मार्ट टीशर्ट के लिये प्रयत्नशील हैं जो कांडक्टिव फ़ाइबर्स से रचित है ,जिनसे छोटे ट्रांसफ़ार्मर फ़ीड होते हैं ,हृदय की धड़कन,रक्त में आक्सीज़न,साँस की गति,तापमान आदि को मानिटर करते रहते हैं - इन शर्ट्स को पहनने-योग्य मदर बोर्ड कहा जा सकता है.शर्ट में बुने हुये कांडक्टिव रेशों के द्वारा बेतार के ट्रांसमीटर को सूचनाएँ जाती हैं जो इंटरप्रेट होकर अस्पताल के मानीटरिंग स्टेशन पहुँचती हैं.
इसके आविष्कारक जार्जिया के टेक्नालाजी के प्रोफेसर सुन्दरेसन जयरामन हैं
यह ,टी शर्ट देखने में साधारण टीशर्ट जैसी लगती है ,मेटीरियल थोड़ा-सा मोटा ,Ace bandage जैसा,.जिसमें कई पोर्ट्स , फ़ोन के जैक समान संयोजकों से युक्त हैं.  उन्होंने यह भी बताया कि सेंसर्स रोशनी में वीडियो का काम करते हैं ,वैसे ही जैसे एक GPS के सिग्नल्स में,
तो अब भविष्य की पोशाकें   शरीर पर अपनी सक्रिय भूमिका निबाहेंगी
शिशु मृत्यु सिंड्रोम, अग्निशामक-दस्तों आदि की ज़रूरत के अनुसार  विशेष संचालकों की व्यवस्था भी होने लगी है.
ब्रिटिश रिटेलर Mark&Spencer के टेक्नालाजी प्रमुख, इयान स्काट का कहना है कि कुछ वर्षों में हम इंटेलिजेंट ब्रा बाज़ार में ला सकते हैं .ये स्पोर्ट ब्रा जो स्ट्रेस , झटकेआदि को सेंस कर अपनी डायमेंशन एडजस्ट कर लेगी और अंगों का पूरा सहारा  बनेगी ,जैसे  खेल दौड़ आदि के झटकों भाँप कर  अपने आप अनुकूलता बना कर शरीर को संरक्षित रखना.
लंदन में फ़िलिप्स डिज़ाइन नामक यूरोपियन व्यवसायी की  लैब में पहनने योग्य इलेक्ट्रानिक्स का स्वप्नागार है .यहाँ पोशाकें तैयार की जाती हैं..इसमे लिनन के ऐसे एप्रन बनते हैं जिनमें पावर प्वाइंट और बिल्ट इन माइक्रोफोन संलग्न हैं ,जिनसे रसोई के एप्लीएंसेज़ बिना हाथ लगाये संचालित हों.जैसे हाट प्लेट आन-आफ़ करना ,कोई रेसिपी स्क्रीन पर दिखाना आदि.लेकिन अभी यह विक्रय के लिये नहीं  केवल ्प्रदर्शन  के लिये.. बाज़ार के आइटम में एक इलेक्ट्रानिक जैकेट (ICD +) जिसेमें  MP3 ऑडियो प्लेयर और सेलफ़ोन ,कालर में माइक्रोफ़ोन,आदि संलग्न हैं. इसमें और एक snazzy लुकिंग पाकेट्स और सिले हुये तारोंवाली जाकेट में थोड़ा ही फ़र्क है.
इसी प्रकार संगीत की लय और धुन से ताल और प्रकाश के प्रभाव देना भी गायिका या नर्तकी की वस्त्र-योजना में सम्मिलित हो जायेगा.  लंदन की एक अग्रदर्शी डिज़ाइनर कैथेरीन से जब पूछा कि क्या वह बोलने वाले कपड़े पसंद करेगी ?
वह बोली," बिलकुल नहीं , कहीं ऐसा न हो कि कपड़े झ़ट् से हमीं को टोक दें  -  हट,झूठे कहीं के ..कह कर'
अब विकसित टेक्नालाजी वाले उत्पादों पर काम हो रहा है,जहाँ कपड़े में ही इलेक्ट्रानिक्स अनुस्यूत  हैं. वस्त्रों की भूमिका बदलती जा रही है.
जीवन में आने वाली समस्याओं के लिये प्राकृति के भंडार में   समाधानों की अपार शृंखला विद्यमान है. बस, ज़रूरत है तो समझने और उचित ढंग से उपयोग करनेवाले  की.
मांट्रियल की नेक्सिया बाइटेक्नालाज़ी कंपनी के संचालक जेफ़ टर्नर, स्पाइडर सिल्क  उत्पादन योजना पर कार्यरत हैं. 42 वर्षीय टर्नर मांट्रियल में उस कंपनी के हेड हैं जहाँ स्पाइडर सिल्क का उत्पादन होता है .उनकी कंपनी  मकड़ी से सबक ले रही है .मकड़ी के जाले का रेशा स्टील के से पाँच गुना मज़बूत होता है.  उसमें खिंच जाने की भी क्षमता होने के कारण वस्त्र-विन्यास के लिये अधिक उपयुक्त है .अत्यंत उत्साही टर्नर का कहना है प्रकृति के पास जीवन की समस्याओं के समाधान की पूरी शृंखला है .उसकी अपार लीला का करिश्मा कब से चला आ रहा है. इसके मूल आधार 20 तरह के अमीनो एसिड्स हैं.         
मकड़ी ने अपने तंतुओँ के लिये जिनका का प्रयोग किया वही हमारे बालों ,त्वचा और शरीर में कार्य रत  हैं .कितनी कुशलता से मकड़ी उनसे लंबा अटूट रेशा खींच कर बुनाई करती है ,  जिसमें इतनी  मज़बूती और पारदर्शिता है.और यह पूरी तरह बायलोजिकल है ,हानिरहित है.
मकड़ियों को तो हम पाल नहीं सकते ,उसने उपाय निकाला मकड़ी के
तंतु  का प्रोटीन-जीन  को बकरी से जीन संयुक्त किया जाय ( जो उस के केवल mammary gland को प्रभावित करता है)फिर उसके दूध से वह तंतु प्रोटीन अलग कर लिया जाय. उस को  प्रोसेस कर उसे कातने पर वही तंतु तैयार हो जायेगा.ऐसे जीनवाली बकरी सामान्य रहती है .जेनेटिकली माडिफ़ाइड बकरी में 70,000 सामान्य बकरी के जीन्स और केवल एक मकड़ी का जीन है, जिससे उसे कोई हानि नहीं पहुँचती.इस नये तंतु को उसने बायोस्टील नाम दिया .यह नायलान से अधिक मज़बूत और बायोडिग्रेडेबिल भी होगा.
सभ्यतायें अपने द्वारा प्रयुक्त सामग्री से परिभाषित होती हैं. जैसे स्टील से औद्योगिक और सिलिकान से कंप्यूटर क्रान्ति हुई ऐसे ही अब  बायो मिमिक्री का युग आ रहा है ,जो प्रकृति की कार्यशाला के प्रयोगों को अपने हिसाब से नियोजित करेगा.
ब्रूनल वि.वि. (दक्षिणी इंगलैंड)के डिज़ाइन फ़ार लाइफ़ सेंटर की आशा थाम्सन ने  पत्रिका के आकार का एक चमकदार पीला तकिया दिखाया -बहुत सारे वाल्यूम कंट्रोल आइकंस से कढ़ा हुआ ,जिनका स्विच ताँबा चढे नायलोन की दो  तहों के बीच दबा था
उसका काम विकलांगों की कई असमर्थताओँ का निवारण करना था.
मानवोपयोगी उपादानों के स्वप्न बुनती आशा थाम्सन जैसे लोगों से मिलकर  इन संवेदनशील वस्त्रो से कौन उदासीन रह सकता है?
आगे-आगे देखिये, किन-किन रेशों से भविष्य अपने ताने-बाने पूरता है !
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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

आवहि बहुरि वसन्त ॠतु -

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 बड़ी तेज़ गति से  चलते चले जाना  -  वांछित तोष तो मिलता नहीं ,ऊपर से मनः ऊर्जा का क्षय !
तब लगता है क्यों न अपनी मौज में रमते हुये पग बढ़ायें ; वही यात्रा सुविधापूर्ण बन ,आत्मीय-संवादों के आनन्द में चलती रहे ......

उस छोर की अनिवार गति और विदग्ध अति  से मोह-भंग के बाद ,सहृदय जनों का ब्लाग-जगत के  सहज  आश्वस्तिमय क्रम में  पुनरावर्तन  होगा -  इसी आशा  में, मैं तो  यहाँ से कहीं गई ही नहीं -

   इहि आसा अटक्यो रह्यो अलि गुलाब के मूल, 
  आवहि बहुरि वसन्त ॠतु, इन डारन वे फूल॥ 
   ( बिहारी )
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रविवार, 18 जून 2017

मैं कौआ नहीं बनना चाहती

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बाहर लान में खुलनेवाली हमारी खिड़की के शेड तले एक भूरी चिड़िया ने घोंसला बनाया है.अब तो अंडों में से बच्चे निकल आये हैं .चिड़िया दूर तक उड़ कर उनके लिये चुग्गा लाती है और वे चारो उसके आते ही चीं-चीं कर अपनी चोंचें बा देते हैं.
मैंने  थोड़ा दाना-पानी यहीं पास में रख दिया .पर चिड़िया ने छुआ तक नहीं, तीन-चार  दिन यों ही रखा रहा . बच्चों के लिये दूर-दूर से चुग्गा लाती है.,घास  झाड़ियों -पेड़ों आदि अपने संसाधनो से अपना खाद्य चुनती हैं.
यहाँ देखती हूँ अनेकानेक पक्षियों को -  चहचहाते हुए,आसमान में उड़ते हुये पेड़ों पर ,लान में फुदकते हुये - पर सब कुछ बड़े करीने से.कोई मौसम हो मुझे तो पत्तों पर मुड़ेरों पर या कहीं भी बीटों का गंदगी नहीं दिखाई देती .बड़े डिसिप्लिंड  लगते हैं .खुले आसमान के नीचे अन्न ,भोजन आदि रखा रहे ,मुगौरियाँ खुली थाली में सूखती रहें चोंचें डालना तो दूर भूखी निगाहों से  देखते तक नहीं.अपने खाने ,अपने दाने से मतलब .मुझे लगता है जैसे जहाँ के लोग होते हैं ,वैसे ही वहाँ के जीव भी हो जाते हैं .
दादी कहती  हैं ,मुँह आई बात रोक लो तो कौए का जनम मिलता है ,और मुझे कौआ नहीं बनना. इसलिये मुँह आई बात कहे डाल रही हूँ .
हाँ ,तो यहाँ खुले में खाने का सामान पड़ा रहे पक्षी चोंच लगाना तो दूर, ललचाई निगाह तक नहीं डालते .उनके लिये अलग से जो दाना होता है वही ग्रहण करते हैं .ये नहीं कि किसी ने खाद्य पदार्थ बाहर या धूप में रखा और मुफ़्तखोरों जैसी इनकी नियत लग गई - खायें सो खायें और बिखेरते हुये उसी में गंदगी मचाते उड़ जायें .न खाने का ढंग ,न बीट करने का..
मैं अमेरिका की बात कर रही हूँ ,भारत का उल्लेख अपने आप हो जाये तो मेरा दोष नहीं.  - हर बात सापेक्ष होती है न.एक के साथ दूसरी लगी-लिपटी .किसी पर दोषारोपण करने का  मेरा इरादा नहीं.बस , मैं कौआ  बन कर जनम नहीं लेना चाहती .
 हाँ ,तो बात गंदगी मचाने की हो रही थी.मुझे लगता है  वातावरण में ही खोट आ जाता है  .देखिये न ,हमारे यहाँ  लोग भी तो पब्लिक के या पराये माल को , मुफ़्त का माल समझते हैं-और हर जगह गंदगी बिखेरना जन्म-सिद्ध अधिकार .वही आदतें पक्षियों में उतर आई
 .पेड़ों के ऊपर के पत्ते तो बीट से पुते ही रहते नीचे की ज़मीन छिंटी हुई - आते-जाते लोगों के कपड़ों और बालों का भी कल्याण हो जाता है कभी-कभी . आजकल सब जगह फ्लैटों वाली  बहुमंज़िली इमारतें खड़ी हैं.बाहर की दीवारों और खिड़कियों के छायादानों पर घने-घने छपके और जमे हुये थक्के जरूर देखे होंगे आपने .पक्षियों की ढेर की ढेर बीट जम कर चिपकी हुई ..  सायबानो के नीचे, मोखों में कितने कबूतर बस जाते हैं कोई गिनती नहीं .रात दिन गुटर-गूँ तो हई .ऊपर से खिड़कियों के शेड बालकनियाँ और छतों की मुँडेरे हर जगह बीटों की सफ़ेदी छाई मिलेगी.खुले में  खाद्य पदार्थ डालकर धूप दिखाना मुश्किल - चोंचें मार-मार कर बिखरायेंगे .खायेंगे सो खायेंगे उसी में अपनी गंदगी छोड़ जायेंगे .बात वहीं आ जाती है , लोगो को जो करते देखते हैं ,वही सीखेंगे.देखते तो होंगे ही  पब्लिक टॉयलेटों,ट्रेनों का हाल,नदी के किनारों पर ,कहाँ तक बताये हर खुली जगह पर .पराये फलों के पेड़ों पर फूलों की क्यारियों पर कैसे हमला बोलते हैं.कोई ढंग की चीज़ देख नहीं सकते अपने सिवा किसी के पास .किसी के घर आम या अमरूद का पेड़ हो ,पत्थर चले आयेंगे बाहर से .दीवार नीची हुई तो फाँदने में कोई परहेज़ नहीं.
मौका मिलते ही दूसरे के उगाये फूल तोड़ लेना स्वभाव में है .बच्चे नहीं बूढ़े तक भगवान के नाम पर परायी फुलवारियों पर हाथ साफ़ करने से चूकते नहीं .उलटा कोई आपत्ति करे तो उसे ही पाप का भागी बनाने पर उतारू..
मुझे लगने लगा है स्वच्छता के भी संस्कार होते हैं जो स्वभाव में बस जाते हैं
और सामाजिक अनुशासन आदत बन कर सहज-व्यवहार में उतरता है.इन चीज़ों का धार्मिकता से कोई लेना-देना नहीं.बल्कि अधिकतर तो धर्म के नाम पर ..., अब आगे क्या कहूँ -जो होता है ,सब को पता है.
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शुक्रवार, 5 मई 2017

ज्ञान की आँधी -

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 बाह्य संसार से जब कोई परेशान हो जाता है, उबरने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता   तो उस झींकन के साथ  उसके अंतःचक्षु खुलने लगते हैं.नई-नई बातें सूझती हैं॒. अगर कहें सहज ज्ञान उत्पन्न होने लगता है तो भी गलत न होगा. नवोत्पन्न  ज्ञान बाह्य जगत की अनेक गर्म-ठंडी स्थितियों से गुज़रते सघन होता जाता है. व्यक्ति में नये बोध जागते हैं ज्ञान चेतता है . उसकी उमड़न तेज़ हो तो आँधी जैसे झकोरे उठने लगते हैं .ऐसा अक्सर कबीर , पलटू दास जैसे अकाम लोगों के साथ होता है और वे सांसारिक जीवन से विरक्त हो ,आत्म-कल्याण की राहें खोजने चल पड़ते हैं .ज्ञान की आँधी उन्हें झकझोरती है, नया चेत स्फुटित होता है और नये पंथों की नींव पड़ती है. 
ऐसे ही बोध के पलों में सिद्धार्थ बुद्ध हुए होंगे. 
तब उन्हें दिखती है एक ही बाधा .ठीकरा स्त्री के सिर फूटता है .और किसी पर तो उनका बस नहीं - धर्म-संकट एक ही -स्त्री. वह आई कि धर्म का आधार खिसका. 
बुद्ध ने स्पष्ट कह दिया था -आनन्द, स्त्री आ गई, अब सद्धर्म केवल 500 वर्ष ही रह पायेगा! 
कितने त्याग-तप-साधना के बाद सद्धर्म विकसता है ,और एक अनचाही वस्तु उसे संकट में डाल देती है. सन्मार्ग की  चाहवाले आदमी के लिये भगवान ने भी कैसी-कैसी -बाधायें रच दी हैं. .स्त्री के मारे धर्म संकट में पड़ा रहता है . 
अपने तुलसी दास ये सब भोगे बैठे थे,उनके अपने अनुभव का सार , या भव पारावार को उलँघि पार को जाय, तिय छबि छाया ग्राहिनी गहै बीच ही आय  - बेचारा बेबस आदमी . करे तो क्या करे?
ईश्वर पर अपना बस नहीं ,कसर स्त्री से निकालो ,पूरी तरह वश में रखने के उपाय खोजो.इसके बस दो उपयोग ठीक -जन्म दे कर पाल-पोस दे ,और भूख लगे तो पेट भर दे -माँगने पर भिक्षा देती रहे . (संतों,भिक्षा तो वह देगी -ऐसा कंडीशंड कर रखा है-कहीं आत्म कल्याण की बात उसके भी मन में आ गई, उसने भी सांसारिकता को गौण समझ लिया तो ग़ज़ब ही हो जायेगा )-देगी ,अपने लिये रखा होगा उसमें से भी देगी- कम खाना गम खाना ,अपनी किस्मत समझ कर. 

स्त्र ही है जो माया-जाल में फँसाती है .भटकाती है ,दुख का कारण है.छोड़ दो सारी चिन्तायें उस पर.   
ओह, कितने-कितने रूप धरती हैं यह, नटिनी है न, नचाना चाहती है हमें भी. 
हमारे मतलब का सिर्फ माँ का रूप है .  बच्ची-बूढ़ी जवान सब में वही रूप मानेंगे .अरे दुनिया है. यहाँ फिसलता कौन नहीं .जब बोध जागे सब धोड़-छाड़ के निकल आओ.साथ रखो यह जादू की छड़ी है 'माँ' शब्द .  तुम बालिका या युवती से माँ कह दो और आशा लगाए लगो उससे कि वैसी ही ढल जाएगी . हाँ, किसा छोटे लड़के से पिता कहना या ,उसमे पितृत्व की संभावना करना  सोच कर ही हँसी आती है न!
तुलसी जब नारी से दूर आगये तो सारी कमियाँ याद आने लगीं. घर-परिवार से वंचित रहे थे ,दुनियादारी में पड़े नहीं पर नारी की अस्लियत पर प्रामाणिक वचन कह गये - 'अवगुन आठ सदा उर रहहीं '.हाँ , नर तो परफ़ेक्ट है. 
अपने  पलटू जी तो किसी महावृद्धा तक का विश्वास नहीं करते ,  साफ़ कहते हैं- अस्सी बरस की बूढ़ी सो , पलटू ना पतियाय !
कारण  है-
साँप बीछि को मंत्र है , माहुर झारे जात ,
विकट नारी पाले परी , काटि करेजा खात
देखा,साँप-बिच्छू से भी ज़हरीली महासंकटा को? सबसे गई-बीती है स्त्री -
नारी की झांई पडत,
अंधा होत भुजंग ।
कह कबीर तिन की गति,
जो नित नारी संग ।।
आगे अपनी कुशलता की चिन्ता ,हरएक को  खुद करनी चाहिये .मलूकदास ने इसी की पुष्टि की है -‘‘एक कनक और कामिनी, यह दोनों बटमार। मिसरी की छुरी गर लायके, इन मारा संसार।। 
संत सुन्दर दास ने इस के प्रत्येक अंग को नरक के समान कहने में भी तनिक संकोच नहीं किया है- 
‘उदर में नरक, नरक अध द्वारन में, कुचन में नरक, नरक भरी छाती है। 
कंठ में नरक, गाल, चिबुक नरक किंब, मुख में नरक जीभ, लालहु चुचाती है 
नाक के नरक, आँख, कान में नरक ओहै, हाथ पाऊँ नख-सिख, नरक दिखाती है। 
सुन्दर कहत नारी, नरक को कुंड मह, नरक में जाइ परै, सो नरक पाती है’। 
नारी की बुराइयों के अनुभवी ये संत लोग किसी और तत्व के होते होंगे ,इनकी देहें इऩ सब तत्वों से परे रहती होंगी. हाँ ये बताओ संतों, उसी पर गुर्राओगे .फिर उसी गृहस्थिन के दुआरे भीख माँगने पहुँचोगे .. हाथ फैलाओगे ,उसका राँधा खाओगे ?
पर करें क्या ?उनका आदर्श वाक्य है -
अजगर करे न चाकरी .पंछी करे न काम,
दास मलूका कह गये सबके दाता राम .पेट भरने का श्रेय भिक्षादात्री को नहीं राम को.
वैसे संत लोग बहुत भले हैं. 
खूब अच्छी-अच्छी बातें करते हैं लेकिन नारी की बात आते ही  एकदम कांशस हो जाते हैं. ऐसी भड़कते हैं, सारा संयम बिला जाता है.तो आपा खो कर  गाली-गलौच पर उतारू हो जाते हैं ,ये ऐसी है वैसी है ,इससे दूर ही रहो ,तुम्हारा जाने क्या-क्या अनिष्ट कर देगी .. इस विषय पर सहज रूप से बात नहीं कर पाते.कुछ-कुछ होने लगता हो जैसे.वे संतई से च्युत नहीं होना चाहते ,पर स्त्री उनके पीछे पड़ी है .सो बेचारे बमक पड़ते हैं.  स्त्री नाम की बला संसार की सारी बुराइयों की जड़ है .पर इससे बचा नहीं जा सकता. कबीर के शब्दों में कहें तो'रुई पलेटी आग' है
पहले तो वे उससे दूर भागने का प्रयास करते हैं ..फिर  बार-बार उझक कर देख  लेते हैं -अब ये क्या कर रही है?अरे, ये ऐसे क्यों कर रही है?इसे ऐसे नहीं वैसे रहना चाहिये .संत जी, तुम दूर चले गये तो छुट्टी करो. मन काहे उसके आस-पास ही मँडराता रहता है? संत हो संतई करो ,दुनिया से तुम्हें क्या मतलब  अपने काम से काम रखो .तुमने नारी-मात्र को सुधारने का ठेका ले रखा है ? क्या संत क्या भक्त दोनो के यही हाल.
 मुझे लगता है यह भारतीय स्त्रियों की विशेषताएँ हैं. विदेशी साहित्यों में  ऐसी शिकायतें मेरे सुनने में नहीं आई. .हाँ, इस्लाम का पूरा पता नहीं  पर उनने पूरी घेराबंदी कर रखी है औरत की - पर नहीं मार सकती.भारत के पुरुष जितने त्यागी  महात्मा, आदर्शवादी,सहनशील महान् आदि आदि होते हैं  ,स्त्रियाँ उतनी ही ..अब .आगे क्या बताऊं, संतजन औऱ भक्तलोग इतना धिक्कारते हैं ,उपदेश देते हैं - लेकिन औंधे घड़े पर कभी कुछ टिका है जो अब टिकेगा?
बाकी आप खुद समझदार हैं.
- प्रतिभा सक्सेना.
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